Skip to main content

Posts

Showing posts from 2017

एक लड़की बड़ा सताती है...

मेरे खवाबों में आकर के, वो मेरी नींद चुराती है |
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

बिखरी बिखरी जुल्फें उसकी शायद वो घटा बुलाती है,
उसके पलकों के काजल से इक बारिश सी हो जाती है |
वो दूर खड़ी हो खिड़की पर मुझे देख देख मुस्काती है,
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

मोती जैसी आंखें उसकी भोली भाली सी सूरत है,
रात की चांदनी में मुझको वो जब देख देख शर्माती है |
उसकी ये हालत देख देख मेरी धड़कन बढ़ सी जाती है,
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

उसकी पायल की छम छम से एक मदहोशी छा जाती है,
ज्यों ही मैं आंखें बंद करू वो मेरे सामने आ जाती है |
उसके आने की आहट से मेरी आंखें खुल सी जाती है,
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

ज्यों ही आँख खुले मेरी वो ख़्वाब सी बन जाती है |
सच बतलाऊं तो यारो, एक लड़की मुझे सताती है ||

चलो हम दोनों मिलकर के किनारा जोड़ देते हैं |

आशाओं की कश्ती का सहारा छोड़ देते हैं, चलो हम दोनों मिलकर के किनारा जोड़ देते हैं |
तुम्हारी आँखों का मंज़र, अभी वैसा का वैसा है, अब हम भी निगाहों को तड़पता छोड़ देते हैं |
हमीं ने आँखों से अपनी, समंदर तक निचोड़े है, आजकल हम ही दरिया को भी प्यासा छोड़ देते है |
हमारा क़त्ल होता है, हमेशा लैला की चाहत में, या ये कह लो की कातिल को हम ज़िंदा छोड़ देते हैं |
लिखी है शायरी हमने, बने गज़ल के शाहजादे है, तआरुफ़ तेरा सुन कर के, हम मिसरा जोड़ देते हैं | 
चलो हम दोनों मिलकर के किनारा जोड़ देते हैं |

जाग रहे हो किसी के लिए या सोये ही नहीं

गहरी थी रात लेकिन हम खोये नहीं,
दर्द बहुत थे दिल में लेकिन हम रोये नहीं|
कोई नहीं है हमारा जो पूछे हमसे,
जाग रहे हो किसी के लिए या सोये ही नहीं ||

तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं

तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं...
तुम मेरे बिचारों की उक्ति, तुम शब्दों का अनुकूल चयन | तुम मेरे शब्दों की प्रतिछाया, तुम ही हो मेरा अंतर्मन | |
तुम बिन अपनी रचना का, औवित्तिय कहाँ से लाऊ मैं | तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं | |  ... (१)
तुम सब रागों की सरगम हो, मेरी सांसों का आरोहन | तुम नृत्य कला का भाव प्रिये, मेरी रचना का समायन | |
तुम न हो तो गीतों में, गहराई कहा से लाऊँ मैं | तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं | |  ... (२)
रंगों की परिभाषा तुम, तुम तस्वीरों का परिप्रेक्ष्य प्रिये | तुम छाया को चेतन करती, तुम रंगों का स्पर्श प्रिये | |
तुम बिन जीवन के पन्नों पर, ठहरा सा ना रह जाऊं मैं | तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं | |  ... (३ )

इंसान को इंसान में इंसान नजर आये

गर मुस्लिम को मस्जिद में राम नजर आए,
गर हिन्दू को मन्दिर में रहमान नजर आए ।

सुरत ही बदल जाये इस दुनिया की जब,
इंसान को इंसान में इंसान नजर आये ॥


मेरा नाम मुक़्क़मल हो जाये

आगाज़ हो तेरे हाथों से, अंजाम मुक़्क़मल हो जाये |
मेरा नाम जुड़े तेरी हस्ती से, मेरा नाम मुक़्क़मल हो जाये | |

दुनिया वालों ने यूँ मुझपर, तोहमत तो हज़ारों रखी हैं |
एक तू जो दीवाना कह दे, इलज़ाम मुक़्क़मल हो जाये | |

ये फूल, गगन, माहताब, घटा, सब हाल अधूरा कहते है |
तू छू ले अपने होटों से, पैगाम मुक़्क़मल हो जाये | |

मैं दिन भर भटका करता हूँ, यादों की ओझल बस्ती में |
जो गुजरे तेरी यादों में, वो शाम मुक़्क़मल हो जाये | |

दे दुनिया मुझको दाद भले, नज़रों को तेरी चाहत है |
एक तेरा तबस्सुम और मेरा, ईनाम मुक़्क़मल हो जाये | |


उसके भोलेपन पर मिट न जाऊँ तो मैं क्या करूँ

उसके भोलेपन पर मिट न जाऊँ तो मैं क्या करूँ
किस कदर नफ़रत है मुझसे यह बताया है मुझे मुझको उसकी दुश्मनी पे नाज़ क्यों न हो कहो
है भरोसा मुझपे ज़ालिम ने जताया है मुझे वो कोई इल्ज़ाम दे देता मुझे तो ठीक था
उसकी चुप ने और भी ज़्यादा सताया है मुझे