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Showing posts from April, 2017

तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं

तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं...
तुम मेरे बिचारों की उक्ति, तुम शब्दों का अनुकूल चयन | तुम मेरे शब्दों की प्रतिछाया, तुम ही हो मेरा अंतर्मन | |
तुम बिन अपनी रचना का, औवित्तिय कहाँ से लाऊ मैं | तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं | |  ... (१)
तुम सब रागों की सरगम हो, मेरी सांसों का आरोहन | तुम नृत्य कला का भाव प्रिये, मेरी रचना का समायन | |
तुम न हो तो गीतों में, गहराई कहा से लाऊँ मैं | तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं | |  ... (२)
रंगों की परिभाषा तुम, तुम तस्वीरों का परिप्रेक्ष्य प्रिये | तुम छाया को चेतन करती, तुम रंगों का स्पर्श प्रिये | |
तुम बिन जीवन के पन्नों पर, ठहरा सा ना रह जाऊं मैं | तुम बिन गीत भले रच दूँ, पर भाव कहा से लाऊँ मैं | |  ... (३ )

इंसान को इंसान में इंसान नजर आये

गर मुस्लिम को मस्जिद में राम नजर आए,
गर हिन्दू को मन्दिर में रहमान नजर आए ।

सुरत ही बदल जाये इस दुनिया की जब,
इंसान को इंसान में इंसान नजर आये ॥


मेरा नाम मुक़्क़मल हो जाये

आगाज़ हो तेरे हाथों से, अंजाम मुक़्क़मल हो जाये |
मेरा नाम जुड़े तेरी हस्ती से, मेरा नाम मुक़्क़मल हो जाये | |

दुनिया वालों ने यूँ मुझपर, तोहमत तो हज़ारों रखी हैं |
एक तू जो दीवाना कह दे, इलज़ाम मुक़्क़मल हो जाये | |

ये फूल, गगन, माहताब, घटा, सब हाल अधूरा कहते है |
तू छू ले अपने होटों से, पैगाम मुक़्क़मल हो जाये | |

मैं दिन भर भटका करता हूँ, यादों की ओझल बस्ती में |
जो गुजरे तेरी यादों में, वो शाम मुक़्क़मल हो जाये | |

दे दुनिया मुझको दाद भले, नज़रों को तेरी चाहत है |
एक तेरा तबस्सुम और मेरा, ईनाम मुक़्क़मल हो जाये | |