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Showing posts from October, 2017

चलो हम दोनों मिलकर के किनारा जोड़ देते हैं |

आशाओं की कश्ती का सहारा छोड़ देते हैं, चलो हम दोनों मिलकर के किनारा जोड़ देते हैं |
तुम्हारी आँखों का मंज़र, अभी वैसा का वैसा है, अब हम भी निगाहों को तड़पता छोड़ देते हैं |
हमीं ने आँखों से अपनी, समंदर तक निचोड़े है, आजकल हम ही दरिया को भी प्यासा छोड़ देते है |
हमारा क़त्ल होता है, हमेशा लैला की चाहत में, या ये कह लो की कातिल को हम ज़िंदा छोड़ देते हैं |
लिखी है शायरी हमने, बने गज़ल के शाहजादे है, तआरुफ़ तेरा सुन कर के, हम मिसरा जोड़ देते हैं | 
चलो हम दोनों मिलकर के किनारा जोड़ देते हैं |