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एक लड़की बड़ा सताती है...

मेरे खवाबों में आकर के, वो मेरी नींद चुराती है |
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

बिखरी बिखरी जुल्फें उसकी शायद वो घटा बुलाती है,
उसके पलकों के काजल से इक बारिश सी हो जाती है |
वो दूर खड़ी हो खिड़की पर मुझे देख देख मुस्काती है,
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

मोती जैसी आंखें उसकी भोली भाली सी सूरत है,
रात की चांदनी में मुझको वो जब देख देख शर्माती है |
उसकी ये हालत देख देख मेरी धड़कन बढ़ सी जाती है,
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

उसकी पायल की छम छम से एक मदहोशी छा जाती है,
ज्यों ही मैं आंखें बंद करू वो मेरे सामने आ जाती है |
उसके आने की आहट से मेरी आंखें खुल सी जाती है,
रोज रात को इसी तराह, एक लड़की बड़ा सताती है ||

ज्यों ही आँख खुले मेरी वो ख़्वाब सी बन जाती है |
सच बतलाऊं तो यारो, एक लड़की मुझे सताती है || 

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माँ की परिभाषा

माँ धरती, माँ आकाश है,
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माँ श्रद्धा, माँ विश्वास है,
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माँ आँगन की तुलसी जैसी,
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माँ सहज बेदना कविता की,
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माँ हर हाथों की शक्ति है,
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माँ केसर वाली क्यारी है |
माँ की उपमा केवल माँ है,
माँ हर घर की फुलवारी है ||

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वक़्त लगता है

दिल-ऐ-इश्क़ इज़हार में, वक़्त लगता है |
नये परिंदों को उड़ने में, वक़्त लगता है ||

दिल के सारे अरमानों को, ख़त में लिखना चाहा है |
प्यार का पहला ख़त लिखने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

इश्क़-ऐ-इज़हार को, आँखों में छुपाकर रखा है |
आँखों से मोहब्बत पड़ने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

तन की बात नहीं है, उसके मन तक मुझको जाना है |
लम्बी दूरी तय करने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

ख़्वाबों में दीदार के तेरे, महल सज़ा इक रखा है |
पर ख़्वाब मुकक्मल होने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

हया का पर्दा आ जाता है, हाल-ऐ-दिल सुनाने में |
हया की बदली के छटने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....