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माँ, मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ

चलते चलते मैं घुटनों से, पैरों पर आपने खड़ा हुआ |
आँचल में तेरी ममता के, जानें कब बच्चा बड़ा हुआ ||

कैसे भूलूँ उस भाषा को, जो होठों से सिखलायी थी |
मुझे सुलाने को रात भर, तुमने जो लोरी गाई थी ||

काला टीका और दूध मलाई, आज भी सब कुछ वैसा है |
मैं ही मैं हूँ हर जगह तुम्हे, जानें ये प्यार तुम्हारा कैसा है ||

सीधा साधा भोला भाला, मैं ही तुम्हे सबसे अच्छा हूँ |
कितना भी बड़ा हो जाऊं माँ, मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ ||

माँ हरियाली है धरती की, माँ केसर वाली कयारी है |
माँ की उपमा केवल माँ है, माँ हर घर की फुलवारी है ||

हर घर माँ को पूजा जाये, ऐसा संकल्प उठाता हूँ |
मैं दुनियाँ की हर माँ के, चरणों में शीश झुकता हूँ || 

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माँ की परिभाषा

माँ धरती, माँ आकाश है,
माँ फैला हुआ प्रकाश है |
माँ श्रद्धा, माँ विश्वास है,
माँ एकमात्र ही आस है ||

माँ आँगन की तुलसी जैसी,
माँ बरगद जैसी छाया है |
माँ सहज बेदना कविता की,
माँ महाकाव्य की काया है ||

माँ ममता की एक मूर्ति है,
माँ संस्कारों की पूर्ति है |
माँ हर हाथों की शक्ति है,
माँ एक प्रेम की भक्ति है ||

माँ हरी दुब है धरती की,
माँ केसर वाली क्यारी है |
माँ की उपमा केवल माँ है,
माँ हर घर की फुलवारी है ||

माँ गंगा, यमुना, सरस्वती,
माँ लक्ष्मी, गौरी देवी है |
माँ ही धरती का स्वर्ग है,
माँ साक्षात ही ईश्वर है ||

माँ झरनों का मीठा स्वर है,
माँ सहस्त्र ढाल प्रखर है |
माँ पूरी की पूरी भाषा है,
बस यही माँ की परिभाषा है ||

मेरा नाम मुक़्क़मल हो जाये

आगाज़ हो तेरे हाथों से, अंजाम मुक़्क़मल हो जाये |
मेरा नाम जुड़े तेरी हस्ती से, मेरा नाम मुक़्क़मल हो जाये | |

दुनिया वालों ने यूँ मुझपर, तोहमत तो हज़ारों रखी हैं |
एक तू जो दीवाना कह दे, इलज़ाम मुक़्क़मल हो जाये | |

ये फूल, गगन, माहताब, घटा, सब हाल अधूरा कहते है |
तू छू ले अपने होटों से, पैगाम मुक़्क़मल हो जाये | |

मैं दिन भर भटका करता हूँ, यादों की ओझल बस्ती में |
जो गुजरे तेरी यादों में, वो शाम मुक़्क़मल हो जाये | |

दे दुनिया मुझको दाद भले, नज़रों को तेरी चाहत है |
एक तेरा तबस्सुम और मेरा, ईनाम मुक़्क़मल हो जाये | |


वक़्त लगता है

दिल-ऐ-इश्क़ इज़हार में, वक़्त लगता है |
नये परिंदों को उड़ने में, वक़्त लगता है ||

दिल के सारे अरमानों को, ख़त में लिखना चाहा है |
प्यार का पहला ख़त लिखने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

इश्क़-ऐ-इज़हार को, आँखों में छुपाकर रखा है |
आँखों से मोहब्बत पड़ने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

तन की बात नहीं है, उसके मन तक मुझको जाना है |
लम्बी दूरी तय करने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

ख़्वाबों में दीदार के तेरे, महल सज़ा इक रखा है |
पर ख़्वाब मुकक्मल होने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....

हया का पर्दा आ जाता है, हाल-ऐ-दिल सुनाने में |
हया की बदली के छटने में, वक़्त लगता है ||
नये परिंदों को उड़ने में.....